बुधवार, 10 दिसंबर 2025

निर्णयों की आखिरी दास्तान


ये आख़िरी अध्याय है मेरी थकी हुई किताब का,
जहाँ अब किसी को खुश करने की ज़िद नहीं रही।
मैंने पन्नों पर बहुत जगह छोड़ दी थी दूसरों के नाम की,
अब उस खालीपन को अपने अस्तित्व से भरने की घड़ी आ गई।

जो आँसुओं से धुलता रहा था कल तक,
आज उससे धूल झाड़कर मैं अपने लिए लिखना सीख रही हूँ।
अब कोई रिश्ता मेरे शब्दों का मालिक नहीं,
कोई उम्मीद मेरी दिशा का पहरेदार नहीं।

तुम समझ लेना—
यहाँ से आगे मेरी राहों पर गुलाब भी मैं रखूँगी, काँटे भी मैं चुनूँगी।
जो बोझ उठाए थे दुनिया के भरोसे पर,
उन्हें अब मैं अपने कंधों से उतार रही हूँ।

मैंने बहुत दिनों तक दिल को दूसरों की दहलीज़ पर रखा,
आज उसे वापस बुलाया है—
थोड़ा घायल है, थोड़ा टूट चुका है,
पर अब इसी टूटन में अपनी ताक़त ढूँढ रही हूँ।

यह अंतिम अध्याय नहीं,
बल्कि पहला अध्याय है—
जहाँ मैं अपने लिए जीने की कला सीख रही हूँ।
जहाँ मेरे निर्णय किसी का एहसान नहीं,
मेरी आत्मा का अधिकार होंगे।

और अगर इसे लोग ‘स्वार्थ’ कहेंगे—
तो हाँ, मैं उतनी ही स्वार्थी रहूँगी
जितना कोई दीपक अपनी लौ बचाने के लिए हवा से होता है।
जितना कोई नदी अपने प्रवाह को बचाने के लिए किनारों से।

अब मेरी चुप्पियाँ किसी का इंतज़ार नहीं करतीं,
मेरी आवाज़ किसी की स्वीकृति की मोहताज नहीं।
मैंने अपनी ही परछाईं का हाथ थाम लिया है
और उसी के साथ चलने की ठान ली है।

ये अंतिम अध्याय है—
पर मेरी कहानी का अंत नहीं।
बस अब आगे की हर कहानी
मैं अपने लिए लिखूँगी,
बेझिझक, बेक़ैद, बेपरवाह…
और शायद पहली बार…
पूरी तरह ज़िंदा होकर।

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