शनिवार, 6 दिसंबर 2025

खामोशी

हर बार मेरी लिखावट से इश्क़ की उम्मीद न रख,
ये तो बस उन खामोशियों का आवरण है,
जो मेरे दिल के भीतर फड़फड़ा कर भी बोल न पाईं।

कभी ये अक्षर मेरी साँसों के साथ थिरकते हैं,
कभी दर्द की तरह पन्नों पर गिरते हैं,
और कभी ख़ामोशी की आड़ में मुस्कुराते हैं।

हर लफ़्ज़ एक उलझन की तरह है,
जो पूछती है, "क्या तुझे समझेंगे?"
और मैं मुस्कुराकर कहती हूँ,
"समझना तुम पर निर्भर नहीं, मेरे दिल पर है।"

कागज़ को छूते ही ये शब्द सजग हो जाते हैं,
बिना पूछे ही मेरी जज़्बात की राह पकड़ लेते हैं।
कभी प्यार की धड़कन बनकर थिरकते हैं,
कभी अधूरे ख्वाबों की तरह छूट जाते हैं।

तो हर बार मेरी लिखावट से इश्क़ की उम्मीद न रख,
ये सिर्फ़ मेरी आत्मा के जले हुए हिस्सों का नक़्शा है,
जो मेरी खामोशी और मेरी आग दोनों को संभालकर रखता है।

और अगर तुम्हें कुछ समझ आए, तो समझ लेना,
मैंने अपने टूटे हिस्सों को सिर्फ़ पन्नों पर सजाया है,
ताकि जो कह न सकूँ, वह शब्‍दों में जी सके।

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