जिससे साँसों का होना ही गुनाह लगे,
दर्द इतना भी क्या…
कि आईने में अपना चेहरा अपना न लगे।
ज़ख़्म वक्त के हों तो मरहम मिलना आसान नहीं,
ये धड़कनों की अदालत है—
यहाँ फैसले भी बेआवाज़ होते हैं,
और सज़ा भी उम्र-क़ैद होती है।
कहते हैं मौत तकलीफ़ देती है,
पर सच तो यह है—
मौत बस एक पल लेती है,
वक्त हर पल लेता है…
धीरे-धीरे, बिना आवाज़, बिना नाम के।
धोखा भी बीत जाता है,
ग़म भी एक दिन सो जाता है,
पर जो लम्हे टूटे हों—
वो तकिए के नीचे वर्षों तक रोते रहते हैं।
कभी किसी को खोना मौत नहीं होता,
किसी के रहते उससे छूट जाना—
बस वही तो असल मातम है।
हम हँसते रहे जैसे सब ठीक है,
पर भीतर एक कोना हर दिन गिरता रहा,
जैसे कोई इमारत खुद को खामोशी में
ईंट-ईंट ढहा देती हो।
वक्त ने बहुत कुछ सिखाया…
किसे भूलना है, किसे याद रखना है,
कहाँ दिल देना है, कहाँ मौन रहना है।
पर सबक की किताब में—
खुशियों का कोई पन्ना अब तक नहीं निकला।
आज भी जिंदा हूँ, पर किस तरह—
जैसे पेड़ सूखा पड़े और जड़ें नम हों,
जैसे बारिश आए पर मिट्टी महक न सके,
जैसे मुस्कान हो पर आँखें हँस न सके।
फिर भी…
एक उम्मीद की लौ ठहरी है दिल के कोने में—
कि शायद किसी सुबह दर्द अपना सामान समेट ले,
और मैं पहली बार ऐसा जिऊँ…
कि साँस लेना भारी न लगे,
और वक्त ज़ख़्म दिखाने के बजाय
ज़िंदगी दिखाए।
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