शनिवार, 6 दिसंबर 2025

मै हार कर भी हारती नहीं

कई बार ज़िंदगी ने
मुझे ज़मीन पर गिराया,
और दुनिया ने सोचा
कि इस बार शायद मैं उठ न पाऊँगी…

पर उन्हें क्या पता था—
मैं मिट्टी में गिरकर
खत्म नहीं होती,
मैं मिट्टी में मिलकर
और ज़्यादा उग जाती हूँ।

हाँ, मैं टूटी…
पर जो टूटता है वही चमकता है,
धातु भी तपकर निखरती है
और मैं तो इंसान हूँ —
मेरे टूटने में भी आग होती है।

उन्होंने सोचा
कि मुझे तोड़कर
मुझे हराया जा सकता है।
पर जीत और हार
मेरे लिए खेल नहीं—
मेरी नसों में दौड़ती ताक़त है।

मैं कभी थक सकती हूँ
पर रुकती नहीं,
आँसू बहा सकती हूँ
पर झुकती नहीं।
क्योंकि मैं जानती हूँ —
जिसे गिराकर भी डर लगता हो,
उससे बड़ा योद्धा कोई नहीं।

मुझे क़ब्र समझकर
कई लोगों ने दफनाया,
और मैं उसी मिट्टी से
क़िला बनकर उठी।

मैं हारती तब
जब मैं मान लेती कि मैं हार गई,
पर मैं वो हूँ
जो हार को देखकर भी
उसमें जीत ढूंढ लेती हूँ।

मुझे हराने की कोशिशें
लोग करते रहेंगे,
मगर मैं हर कोशिश को
सीढ़ी बनाना सीख चुकी हूँ—
अब मेरी राह में मुश्किल हो
या तूफ़ान,
दोनों मेरे इंधन हैं,
मेरी कमज़ोरी नहीं।

मैं हारती नहीं…
क्योंकि मैं रुकती नहीं।
और मैं रुकती नहीं…
क्योंकि मैं किसी मंज़िल से नहीं
खुद से बंधी हूँ।

जिस दिन दुनिया समझेगी
कि मैं कैसी आग हूँ—
तब लोग मेरे गिरने से नहीं
मेरे उठने से डरेंगे।

और याद रखना—
अगर किसी और ने मुझे हराया
तो वो उसकी जीत नहीं होगी,
वो जीत भी इसी की होगी…
क्योंकि मैं हार कर भी हारती नहीं,
मैं हर वार के बाद और तेज़ बन जाती हूँ।

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