शनिवार, 6 दिसंबर 2025

चलन जारी है

थक चुकी हूँ कई मोड़ों पर,
पर मंज़िल की प्यास अब भी धड़कनों में जल रही है,
जीवन के पत्थरीले रास्तों पर
आस्था की आख़िरी चिंगारी
अब भी मुट्ठियों में जल रही है।

नाव मेरी डगमगाती है
लहरों में कभी, हवाओं में कभी,
कभी ज्वार की निष्ठुर चोटों में,
कभी भँवर की दहाड़ों में घिरी,
पर मेरे पतवारों पर अभी भी
हार मानने का कोई अक्षर नहीं लिखा—
तैरना… डूबना… उठना… फिर चलना…
बस यही मेरा विधान जारी है।

विचारों के कुंभ में
कितनी बार संकल्प टूटा,
कितनी बार मन चूर होकर
खामोश दीवारों से टकरा कर रोया,
पर फिर भी मेरे अंतर्मन की गुफ़ाओं में
एक तिल-सी जिद है,
जो कहती है —
“अभी सब ख़त्म नहीं, तुम अभी भी पूरी हो।”

दर्द के कंधों पर बैठकर भी
सपनों का सूरज ढो रही हूँ,
ख़ाक से उठकर भी
आसमान को बो रही हूँ,
क्योंकि टूटकर भी जहाँ मंज़िलें जन्म लेती हैं,
वहीं मैं अपनी कहानी लिख रही हूँ।

हाँ… कुछ चेहरे चाहते हैं
मेरी रूह पर सफ़ेद चादर बिछा दी जाए,
मेरी चुप्पियों को मृत्यु घोषित कर दिया जाए,
पर उन्हें क्या पता—
इन घुटन भरी साँसों के भीतर ही
धड़कनें अब भी युद्ध लड़ रही हैं,
नाड़ी में रुख़सत का नहीं,
रचनाओं का चलन जारी है।

ज़िन्दगी चाहे जितनी दीवारें उठाए,
मैं हर ईंट हटा कर
अस्थियों में आशा का दीपक रखती जाऊँगी,
थकान चाहे जितनी दिशा लूट ले,
मैं धुंधले क्षितिज में भी
अपना सूर्य खोजती जाऊँगी।

क्योंकि मेरी कहानी हार की नहीं—
अविराम प्रयास की कथा है,
क्योंकि मेरी सांसों में मौत नहीं—
निर्माण का स्वर चलता है,
और क्योंकि
मैं जीने के लिए पैदा हुई हूँ,
इसलिए मेरा जीना—
चोटों के बीच भी
जारी है… जारी है… जारी है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें