बुधवार, 10 दिसंबर 2025

यादें लम्हे और दिसंबर

कुछ यादों की खिड़की खुली है अभी,
बीते दिनों की महक रिस रही है धीरे-धीरे,
चंद सुर्ख लम्हें—जैसे शाम का आख़िरी सुर,
दिल की दरीचों पर अब भी हल्के से धड़कते हुए।

ज़िंदगी अपनी ही रफ़्तार से फिसलती चली गई,
जैसे हथेलियों की लकीरों से रेत झरती है,
कुछ चाहतें बयान हो न सकीं,
कुछ ख़्वाब सफ़र में ही सो गए।

दिसम्बर की सांसों में ठंडक है,
मगर उसके भीतर एक अजीब गर्माहट—
जो खोए हुए को छू लेने का मन करती है,
और पाए हुए को थाम लेने का।

ये महीना हमेशा जाता नहीं,
कुछ अपने लिए भी छोड़ जाता है—
एक धुँधली सुबह का एहसास,
एक खामोश रात की चुभन,
एक पुरानी मुस्कान की परछाईं।

कभी लगता है,
दिसम्बर हर बार हमें थोड़ा और बदलकर जाता है—
कुछ बोझ हल्के कर देता है,
कुछ घाव ताज़ा भी कर जाता है।

और हम?
हम बस खिड़की पर टिके,
बीते मौसमों की आवाज़ें सुनते रहते हैं—
कभी उम्मीद की तरह,
कभी राज़ की तरह।

यादें, लम्हें, जिंदगी और दिसम्बर…
ये चारों मिलकर एक ही बात कहते हैं—
कि कुछ भी रुकता नहीं,
फिर भी सब दिल में ठहर जाता है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें