किसी ऐसे हाथ की
जो मुझे थाम ले…
किसी ऐसे दिल की
जो मुझे समझ ले…
किसी ऐसे साथ की
जो मेरे बिना भी मेरा हो।
मगर फिर एक दिन
ज़िंदगी ने आईने की तरह
कड़वा सच दिखा दिया—
तलाश जितनी बाहर होगी,
कमी उतनी भीतर जलती रहेगी।
और तब मुझे एहसास हुआ—
जिसको मैं ढूंढ रही थी
वो कोई और नहीं,
मैं खुद थी।
अब मुझे किसी की ज़रूरत नहीं—
न सहारे की,
न हमसफ़र की,
न रोने के लिए कंधे की,
न जीने के लिए वजह की।
क्योंकि अब मैंने
अपने भीतर ही
वजह भी ढूंढ ली,
सहारा भी…
और घर भी।
अब मैं अपनी मुस्कान की मालिक हूँ,
और अपने आँसुओं की रखवाली।
अब मुझे मनाए जाने की चाह नहीं,
अब मुझे छोड़कर जाने का डर नहीं—
क्योंकि मेरी दुनिया
किसी एक इंसान से नहीं,
मेरे वजूद से चलती है।
जो रहना चाहे
इज़्ज़त से रहे,
और जो जाना चाहे
दरवाज़ा खुला है—
मगर मेरी आत्मा पर
अब किसी के कदमों का अधिकार नहीं।
मेरा प्यार अब कमजोरी नहीं,
मेरी दयालुता अब गुनाह नहीं,
मैं अपनी कीमत जानती हूँ
और उसे किसी की नजर की भूख पर
बेचने वाली नहीं।
मैं भीड़ में रानी हूँ,
और तन्हाई में साम्राज्ञी—
क्योंकि मेरा ताज
किसी के आने से नहीं,
मेरे खुद के खड़े होने से सजता है।
अगर कोई आता है
तो खूबसूरत है,
पर अगर कोई नहीं आता
तो भी जिंदगी पूरी है।
क्योंकि मेरा दिल जान चुका है—
मेरा सबसे बड़ा साथ
मैं खुद हूँ।
और आज…
पूरी दुनिया सुन ले—
मुझे किसी की ज़रूरत नहीं,
मैं खुद काफ़ी हूँ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें