शनिवार, 6 दिसंबर 2025

सखी

सखी,
कुछ पल सिर्फ अपने लिए भी निकालो,
जैसे सूखते पत्तों पर धूप का पहला स्पर्श।
सावधान मत रहो, मत सोचो कि समय व्यर्थ हो रहा है,
क्योंकि वक्त का पिंजरा,
कभी-कभी अपनी परछाई तक थाम नहीं पाता।

सखी,
जीवन की यह उड़ान अनिश्चित है,
हवा का रुख कभी भी बदल जाता है।
आज जो पल तुम्हारे पास है,
वो कल सिर्फ यादों में बसा रहेगा।
तो हँस लो, रो लो, गुनगुनाओ,
अपने भीतर की उस आवाज़ को मत दबाओ।

सखी,
क्या ख्वाब थे जो तुमने अधूरे छोड़ दिए?
उनको अब मत टालो।
रंग भरो अपनी दुनिया में,
अपने लिए, अपनी आत्मा के लिए।
क्योंकि यह पिंजरा जिसे हम वक्त कहते हैं,
कभी भी खुल सकता है… और तुम्हें छोड़ सकता है।

सखी,
कभी मत भूलो—
तुम्हारा समय तुम्हारा अधिकार है,
तुम्हारी सांसें तुम्हारा गीत।
आज खुद को गले लगाओ,
कल के लिए नहीं, अभी के लिए।
पिंजरे में कैद है यह जिंदगी,
पर उड़ान की अनुमति भी तुम्हारे हाथों में है।

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