सोमवार, 1 दिसंबर 2025

मै टूटी थी पर झुकी नहीं

कभी खाली हाथ निकली थी घर से,
चुपचाप बिना शिकायत किए,
ख्वाहिशों को मोड़कर आंचल में रखा
और मुश्किलों से दोस्ती किए।

खाली जेब देखकर दुनिया मुस्कुराई,
किस्मत पर ताने फेंके,
कहा — “औरतें सपने क्या देखें?”
पर मैंने सपनों को आँसू बनाकर नहीं बहने दिए,
हवा बनाकर चलने दिए।

पेट की भूख बड़ी थी,
पर आत्म-सम्मान उससे बड़ा,
कदम चाहे काँपते रहे,
पर इरादे कभी डगमगाए नहीं ज़रा।

दिल भी टूटा एक बार नहीं — कई बार,
किसी प्रेम में, किसी भरोसे में,
किसी रिश्ते में, किसी वादे में;
पर हर बिखराव ने भीतर
एक औरत नहीं —
एक आंधी जगा दी।

दुनिया ने सोचा था चुप कर देंगे,
सवालों की आग बुझा देंगे;
पर मुझे क्या पता था
कि राख में सोई चिंगारी
एक दिन सूरज बन जाएगी।

खाली पेट ने सिखाया —
सबसे पहले खुद को खिलाना है;
खाली जेब ने सिखाया —
कीमत पैसों की नहीं, हौसलों की लगानी है;
टूटे दिल ने सिखाया —
अपनी धड़कन खुद की बनानी है।

आज मैं वही हूँ —
पर वैसी नहीं,
सब कुछ खोकर भी पूरी हूँ,
जली हूँ, पिघली हूँ, पर सोना बनी हूँ।

अब कोई तिरस्कार नहीं डराता,
ना कोई त्याग मुझे थकाता,
क्योंकि आज मैं जानती हूँ —
औरत का दुख उसे रोकता नहीं,
बल्कि गढ़ता है, तराशता है, उठाता है।

आज…
मैं हर घाव को अपने माथे का तिलक मानती हूँ,
हर आँसू को अपनी शक्ति का सिंदूर;
क्योंकि अगर वो रातें न होतीं
तो मैं आज की यह स्त्री न होती —
अडिग, अजेय, और अमर।

हाँ, मैं टूटी थी…
पर झुकी नहीं।
और यही मेरी जीत की सबसे पहली पहचान है।

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