मेरी वफ़ा जाने कौन सी कमी रह गयी।
ना सर पर आसमा ना नीचे ज़मी रह गयी।।
मैंने तो ख्वाहिशों में चाही थी तेरी खुशियाँ।
जिंदगी की उलझने फिर भी बनी रह गयी।।
अपनी बात पर यकीन दिलाने की चाह में।
मै झूठ और सच में यूँही खड़ी रह गयी।।
जख्म सीने में दफन कर लूँ बता किस तरह।
आज भी उनकी नज़रों में गिरी रह गयी।।
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