रोज खुशबू की तरह शहर से गुजरती हूँ मै।
रोज शीशे के मानिंद (तरह )टूट के घर जाती हूँ।।
मुझसे टकरा कही जाए काश मुकद्दर मेरा।
बस यही सोच के गलियों से गुजर जाती हूँ।।
उनका मिलना भी हो तो वो ना बिछड़े कभी।
ख्याल जुदाई का सोच के भी मै डर जाती हूँ।।
तेरे हुजूम में कही मेरा नाम भी होगा हमदम।
ऐसी बातो से मै भी अक्सर सँवर जाती हूँ।।
वो खुशबू बन के बस गया है मेरे तसब्बुर में।
बिखर ना जाए कही ख्याल से बिखर जाती हूँ।।
इसी ख्याल से शहर से गुजरती हूँ साहिब।
बस अक्सर शीशे की तरह टूट के घर जाती हूँ
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