आओं एक बार तुम्हे
कुछ सामान दे दू।
खुले आसमान के नीचे
एक नया आसमान दे दू।
मांग ले अगर तू तो
तुम्हे सारा जहां दे दू।
इबादत करती हु जिसकी
अपना वो भगवान दे दू।।
आओं एक बार तुम्हे
कुछ सामान दे दू।
दिल में छुपा के रखा है जो
वो सारे अरमान दे दू।
बिगड़े हालात के साथी थे जो
मै वो सारे इंसान दे दू।
मेरी खुदगर्जी की पहचान है जो
अपना वो ईमान दे दू।
आओ एक बार तुम्हे
कुछ सामान दे दू।
आओ ना!
एक बार तुम्हे
फिर से एक खुला
आसमान दे दू!!!!!!
मैं एक कवयित्री और लेखिका हूँ, जो शब्दों में अपनी भावनाओं की छवियाँ उकेरती है। यह मेरा छोटा-सा संसार है, जहाँ एहसास कविता बनकर और अनुभव शब्द बनकर जीवित हो उठते हैं।
बुधवार, 30 सितंबर 2015
आओ तुम्हे एक खुला आसमान दे दूँ
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