शनिवार, 26 सितंबर 2015

शायद

फिर कोई ख्वाब ना देना तुम इस दिल को मेरे
ख्वाब टूटे जो मरे तो शायद मै बिखर जाऊँगी।

हँस के जीने का कोई शौक नही मुझको साहिब।
तोड़ के एहसास की दुनियाँ को संवर जाऊँगी।।

बहुत बाँधा तूने ऐ वसूल ए मुहब्बत दिल को।
अब जख्म दे तो शायद मै भी बदल जाऊँगी।।

बहुत भटकी हूँ मै तुझे चाह के चाहत के लिए।
तुझसे मुहब्बत की सजा देख मै भी पाऊँगी।।

मै ही नादाँ थी जो समझी नही जमाने का चलन।
आग लग ही गयी तो देख अब जल जाऊँगी।।
  #दिव्या

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