कल दिखी मुझे
एक धुंधली सी
परछाई
मन से आवाज आई
कही तुम वही तो नहीं....
वर्षो से जिसे ढूंढता
है व्याकुल मन
कभी तस्वीरो में
कभी हाथ की
लकीरों में दिन की
उजास में कही तुम
वही तो नहीं....
तुम मेरे बीते
वक्त की पहचान
हो और तुमसे
जुडी है मेरी
बहुत सारी यादें
मेरे क्रोध में
मेरे प्रेम में
ह्रदय में तुम ही
तुम ही तो हो
तभी दिल ने
फिर से एक बार
पूछा कही तुम
वही तो नही...
कही तुम
वही तो नही....
मैं एक कवयित्री और लेखिका हूँ, जो शब्दों में अपनी भावनाओं की छवियाँ उकेरती है। यह मेरा छोटा-सा संसार है, जहाँ एहसास कविता बनकर और अनुभव शब्द बनकर जीवित हो उठते हैं।
बुधवार, 30 सितंबर 2015
कही तुम वही तो नही?
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