गर मुहब्बत की हद नही कोई
तो दर्द का हिसाब क्यों रखूँ।
जिसे पढ़ना हो आसान यहाँ
मैं भी ऐसी किताब क्यों रखूँ।
महकी फ़िजा उनकी खुसबू से
मैं अपने घर में गुलाब क्यों रखूँ।
भटकते रूह में बस जाता है वो
दिल में उलझे सवाल क्यों रखूँ।
मेरी साँसों गर बसा है वो साथी
अब मै उड़ती बयार क्यों रखूँ।
वो शख्श ही सबकुछ है मेरे लिए
दुनियाँ से मै व्यवहार क्यों रखूँ।
तू मेरे साथ साथ रहता है हरपल।
तेरा इन्तजार अब मै क्यों रखूँ।
जिसे पढ़ना हो आसान यहाँ
मै भी ऐसी किताब क्यों रखूँ।।
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