अव्यक्त अनकहे कुछ लफ्ज़
आज भी मचलते है
रिक्त मन के कोने से जाने क्यों
आज भी सिसकते है
क्या बाकी रहा क्या छूट गया
क्यों स्नेह का रिश्ता टूट गया।
मन तो तेरा भी निश्छल था
मन तो मेरा भी निश्छल था।
कई सवालो में उलझी थी और
मन का धागा टूट गया।
ना बिफर सकी ना सिहर सकी
की उनसे रिश्ता छूट गया।
कोमल मन के कोने से आतुर
कुछ बाते आज भी निकलने
तड़पते है मचलते है और
धीरे धीरे सिसकते भी है...
मैं एक कवयित्री और लेखिका हूँ, जो शब्दों में अपनी भावनाओं की छवियाँ उकेरती है। यह मेरा छोटा-सा संसार है, जहाँ एहसास कविता बनकर और अनुभव शब्द बनकर जीवित हो उठते हैं।
रविवार, 27 सितंबर 2015
सिसकतें लफ्ज़
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