रविवार, 27 सितंबर 2015

सिसकतें लफ्ज़

अव्यक्त अनकहे कुछ लफ्ज़
आज भी मचलते है
रिक्त मन के कोने से जाने क्यों
आज भी सिसकते है
क्या बाकी रहा क्या छूट गया
क्यों स्नेह का रिश्ता टूट गया।
मन तो तेरा भी निश्छल था
मन तो मेरा भी निश्छल था।
कई सवालो में उलझी थी और
मन का धागा टूट गया।
ना बिफर सकी ना सिहर सकी
की उनसे रिश्ता छूट गया।
कोमल मन के कोने से आतुर
कुछ बाते आज भी निकलने
तड़पते है मचलते है और
धीरे धीरे सिसकते भी है...

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