रुको ना!!
इस घर में कुछ सामान है
मेरे कुछ अरमान है
समेट लूँ
फिर चलती हूँ
तुम्हारी दुनियाँ में...
रुको ना!!
कितने ख्वाब सजाये थे
इस घर की दरो दीवार पर
हर एक कोना सजाया था
अपनों के ऐतबार पर
निहार लूँ
फिर चलती हूँ
रुको ना..
तुम्हारी दुनियाँ में...
एक उम्र बीता है
इसी चौखट पर
यही वो दर्पण है
जिसमे देखा है
वर्षो अपना अक्स
इस काया को उतार लूँ
फिर चलती हूँ
तुम्हारे साथ
तुम्हारी दुनिया में
रुको ना.....
मैं एक कवयित्री और लेखिका हूँ, जो शब्दों में अपनी भावनाओं की छवियाँ उकेरती है। यह मेरा छोटा-सा संसार है, जहाँ एहसास कविता बनकर और अनुभव शब्द बनकर जीवित हो उठते हैं।
रविवार, 27 सितंबर 2015
रुको ना!!
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