सोमवार, 28 सितंबर 2015

खुद की तलाश

वर्षो बीत गए
खुद में खुद की तलाश
करते हुए...
पर आज भी वो तलाश
पूरी नही हो पायी
कैसी बिडम्बना है
कहने को मै तो मै हूँ
पर मुझमे मै कहाँ??
उम्र के हर मोड़ पर
मेरी पहचान छुपी रह गयी
कभी बेटी...फलां की
कभी बीबी...फलां की
तो कभी माँ...फलां की
तो आखिर मै कहाँ???
कितनी बार घुटी हूँ
ये सोचकर मेरा अस्तित्व
तो सभी स्वीकारते है
पर वास्तव में मै कहाँ??
क्या अस्तित्व होते हुए
भी अस्तित्व विहीन हूँ
या नारी होना मतलब
अस्तित्व को खोना..
देखो ना जन्म से लेकर
आज तक संस्कारो
में पली हूँ
फिर भी जाने क्यों
समाजिक बेड़ियों से
जड़ी हूँ..तो फिर
कहो ना मुझमें मै
कहाँ हूँ???
मुझे खुद की तलाश है..

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