वर्षो बीत गए
खुद में खुद की तलाश
करते हुए...
पर आज भी वो तलाश
पूरी नही हो पायी
कैसी बिडम्बना है
कहने को मै तो मै हूँ
पर मुझमे मै कहाँ??
उम्र के हर मोड़ पर
मेरी पहचान छुपी रह गयी
कभी बेटी...फलां की
कभी बीबी...फलां की
तो कभी माँ...फलां की
तो आखिर मै कहाँ???
कितनी बार घुटी हूँ
ये सोचकर मेरा अस्तित्व
तो सभी स्वीकारते है
पर वास्तव में मै कहाँ??
क्या अस्तित्व होते हुए
भी अस्तित्व विहीन हूँ
या नारी होना मतलब
अस्तित्व को खोना..
देखो ना जन्म से लेकर
आज तक संस्कारो
में पली हूँ
फिर भी जाने क्यों
समाजिक बेड़ियों से
जड़ी हूँ..तो फिर
कहो ना मुझमें मै
कहाँ हूँ???
मुझे खुद की तलाश है..
मैं एक कवयित्री और लेखिका हूँ, जो शब्दों में अपनी भावनाओं की छवियाँ उकेरती है। यह मेरा छोटा-सा संसार है, जहाँ एहसास कविता बनकर और अनुभव शब्द बनकर जीवित हो उठते हैं।
सोमवार, 28 सितंबर 2015
खुद की तलाश
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें