रविवार, 27 सितंबर 2015

मेरी राह

गम नहीं जहाँ का चाहे कितना भी खिलाफ हो,
चलूँगी उसी राह पर जो सीधी और साफ हो...!

लोग मिलते है यहाँ डाले हुए चेहरे पर नकाब।
वो साथ हो ले मेरे राह में जो बेनकाब हो....!

सच झूठ की बातो से फिर घायल है दिल मेरा।
या खुदा खुदगर्जों के सारे गुनाह माफ़ हो...!

ना मिला किसी को यहाँ मुकम्मल जहाँ तो क्या।
पर दर्द के मेरे भी तो कुछ भी हिसाब हो...!
  

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