मैंने देखा है अक्सर इधर उधर
जहाँ तहाँ की
प्रेम का सूरज
अस्त होने के लिए ही उगता है
कभी नहीं रुकता कोई
एकमात्र प्रेम के लिये
प्रेम के सहारे।
चाहे कितना भी
जज़्बाती रंग चढ़
जाए
चाहे कितना भी
रौशनी रंग भर
जाए
पर कोई रुकता नही
सिर्फ प्रेम के लिए
या
प्रेम के सहारे।
चमक जाए हथेली भी
तो क्या।
तन्हाई में मिल जाए
यादों की सहेली
भी तो क्या...
कभी जो टूट जाए
अहसासो की डोर
बुझ जाए चराग़
अँधेरा हो जाए
चहु ओर
पर सत्य तो
सत्य है
कोई टूटता नही
प्रेम के लिए
प्रेम के सहारे...
मैं एक कवयित्री और लेखिका हूँ, जो शब्दों में अपनी भावनाओं की छवियाँ उकेरती है। यह मेरा छोटा-सा संसार है, जहाँ एहसास कविता बनकर और अनुभव शब्द बनकर जीवित हो उठते हैं।
शनिवार, 26 सितंबर 2015
प्रेम
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