दस्तूर इस जिंदगी का हर पल बदलता रहा।
हम बूत से खड़े रहे और वक्त चलता रहा।।
जिसकी देते रहे मिशाले सब लोग दर बदर।
नजर का एक धोखा हर पल बदलता रहा।।
किसको अपना कहे हम जमाना है जल रहा।
एक हवा के झोके से ही हर शै जलता रहा।।
सासों को जिंदगी की तलब अब नही है यार।
बेगुनाही में भी अब ये ईमान भी मरता रहा।।
किस घर गली की बात है सुरक्षित है बेटियाँ।
हर तरफ एक रावण है जो नारियाँ हरता रहा।।
दिव्या
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