सोमवार, 28 सितंबर 2015

काश!मै बिखरी न होती

दिन के उजास में कुछ
लम्हों को ढूढ़ती मै।
अपने बीते हुए कल को
जीने की चाह में
काश...
खोज लाती उन सब
सपनो को जिसे देखा
था कभी तुम्हारे लिये
कभी अपने लिए..
पेड़ो की सुखी पत्तियो
से बिखरे हुए
मेरे सपने..
यादो में आज भी
भटकते है
मेरे अधूरे सपने
स्याह रातो में जो
कभी बसते थे चांदनी
बनकर आँखो में
काश..
पा लेती उन अधूरे
सपनो को
छु लेती मन की
आँखो से
उन लम्हों को
लेकिन तब
जब पेड़ की सुखी
पत्तो सी
बिखरी ना होती
काश...

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