बुधवार, 30 सितंबर 2015

हर बात कहेंगी

आँखे गर भर आई
कुछ ख़ास कहेंगी
बीते हुए कल की
हर बात कहेंगी।
वो बाते पुरानी
तुम्हे थी सुनानी
लहू में रवानी
बेख़ौफ़ थी जवानी।
उन दिनों के ये सारे
अंदाज कहेंगी
बीते हुए कल की
हर बात कहेंगी।
वो सपनो का बुनना
वो ख़्वाबों में उड़ना
वो जुगनू पकड़ना
वो खुद पर अकड़ना।
फिर से वो सारी
दास्तान कहेंगी
बीते हुए कल की
हर बात कहेंगी।
वो सखियों की टोली
वो मस्ती की बोली
वो बाते सुहानी
वो अपनी कहानी।
कहानी और सारे
जज्बात कहेंगी
बीते हुए कल की
हर बात कहेंगी।
क्या दिन थे वो भी
क्या पल थे वो भी
उस पल का गुजरना
और फिर अब अखरना।
पा लूं वो फिर से
हालात कहेंगी
बीते हुए कल की
हर बात कहेंगी।।

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