बुधवार, 30 सितंबर 2015

जवाब दो

आज मै सवाल करती हु
जवाब दो तो मान जाये तुम्हे।
गर हम इंसान है
हमारी इंसानियत कहाँ है?
क्यों जकड़े है हम बेड़ियों में?
बेवजह की रुढियो में?
क्यों जुड़ नही पाते हम सब
एक कड़ीयो में?
बेकार की रीतियाँ
अनसुलझी नीतियाँ
जिनका ना कोई आकार
जिनका ना कोई प्रकार
उलझ रहे है क्यों बेकार के सवाल में?
जवाब दो तो मान जाये तुम्हे।
क्या इंसानों का धर्म यही है?
चोट देना किसी को अधर्म नही है?
क्या मन को मार देना अभिशाप नही है?
उलझ रहे है क्यों बेकार के बवाल में।
जवाब दो तो मान जाए तुम्हे?
क्या बना सकते है हम एक नया समाज?
बदल सकते है क्या हम बेकार के रिवाज?
सुना है आज मानव सभ्य हो रहा है।
क्या बना सकते है अब हम एक नया मिशाल?
जवाब दो तो मान जाए तुम्हे।

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