कही उलझ गयी जिन्दगी
की डोर कुछ हुवा तो नही
कैसी खामोशी है
क्यों थम गया है शोर
क्यों भीड़ में तनहा सी
जिन्दगी है
क्यों बोझिल सी साँसे
क्यों उखड़ा सा मन है
क्यों धुंधला सा दर्पण
कहो ना कुछ हुवा तो नही।
समझाओ ना एक बार
बतलाओ ना एक बार
क्यों टूटने लगे है तार
क्यों रुठा है प्यार
क्या उजड़ गया संसार।
आने वाले जीवन का
कैसा आगाज है
बीते लम्हों का ये
कैसा अंजाम है
ये कैसा अंजाम है???
मैं एक कवयित्री और लेखिका हूँ, जो शब्दों में अपनी भावनाओं की छवियाँ उकेरती है। यह मेरा छोटा-सा संसार है, जहाँ एहसास कविता बनकर और अनुभव शब्द बनकर जीवित हो उठते हैं।
बुधवार, 30 सितंबर 2015
ये कैसा अंजाम है
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