गुरुवार, 1 अक्टूबर 2015

वृद्ध दिवस पर

बड़े नाजो से पाला था सारे दुःख सह गयी।
पर अभागन माँ मै आज अकेली रह गयी।।

बेटा जो मेरे सारे जीवन का एक सहारा था।
उसी बेटे ने एक दिन मुझे घर से निकाला था।।

उमर का क्या अब थोड़े दिन का ही गुजारा है।
चली जाऊ दुनियाँ से यहाँ अब क्या हमारा है।।

उसे ना धूप लग जाए मेरा आँचल सहारा था।
कह दिया फर्ज था तेरा जो तूने खुद उतारा था।।

चलो तुम्हारी ख़ुशी की खातिर मै सब सह गयी।
इसीलिए तो अपने अंत में मै अकेली रह गयी।।

खिला के पेट भर खाना उसे भूखी ही सोती थी।
रोता था मेरा बच्चा अगर तो मै भी रोती थी।।

मेरी ममता का मोल नही उसको गवारा था।
यही सोच कर उसने मुझे घर से निकाला था।।

कोई बात नही मै बोझ थी उसके जमाने की।
तभी तोकोशिश की शायद मुझको भुलाने की।।

मगर एक बात सुन बेटे आखिरी वक्त है मेरा।
भेज दे कफ़न मेरे लिए क्योंकि तू लाल है मेरा।।

मुझे अब तेरे कन्धों का नही कोई सहारा है।
इसीलिए तो तुमने मुझे घर से निकाला है।

तुझे आशीष है मेरा तेरी दूनियाँ महक जाए।
तेरा बेटा तुझे हक दे तू हरदम घर में रह जाए।।

तेरी बगिया भरी हो चाँद आँगन में उतर जाए।
तू दुनिया में हमेशा खूब खुदा की रहमते पाये।।

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