सोमवार, 12 अक्टूबर 2015

एक सच

दोपहर तक बिक गया बाजार का हर एक झूठ,
और मैं एक सच लेकर शाम तक बैठी रही।।

हजार चेहरों से रूबरू हुवा वजूद मेरा लेकिन।
सच का चेहरा ना दिखा मै शाम तक तकती रही।।

काश! की खोज रही काश! की बुलन्दी तक।
हर एक झूठ में उस काश! को ढूँढती ही रही।।

बोलबाला है आज भी बाजार में झूठ का देखो।
एक सच के साथ मै धुप में हर बार ही जलती रही।।

बेनकाब होगा किसी रोज झूठ का परदा यारो।
जिसके आड़ में ये मुफलिसी आज तक पलती रही।।

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