शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

नजर आता है

आईना तुझमे मुझे एक शहर नजर आता है।
फिजाओं में घुला है जो जहर नजर आता है।।

झुग्गियाँ जल गयी बदनसीबो की देखा मैंने।
उनके पीछे की हर एक वजह नजर आता है।।

मांग कर भी नही मिलता जिन्हें जीने के लिए।
उनके चेहरे का हर एक सन्ताप नजर आता है।।

रोज घुटता है दम मेरा आईने में किस तरह।
अब तो हर चेहरे में मुझे पाप नजर आता है।।

खुद से टुटा है वजूद ए शहर देख तो जरा।
जाने क्यों आज हर एक वजह नजर आता है।।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें