कभी ख़ामोशी में पूछना
खुद से या जमीर से
ये जो तुम अपनेपन का
दम भरते हो
क्या सचमुच तुम मुझपर
यकीन करते हो।
दिखावे की आँच में झुलसता
जमीर मेरा है
सच कह रही हूँ
बस जी भर रही हूँ
जीने के लिए आई थी
उम्मीद का चोला पहन कर
उतार के रख दिया
यकीन मानो तुमने मुझे
मार के रख दिया।
तुम्हे सब यूँ ही लगता है
पर पलट के देखो तो
किसी का आस जलता है
सब तो तुम्हारे है
और तुम सबके
मेरा कौन??
मेरा अस्तित्व आज फिर
मौन।
जीने की चाह में सबकुछ
गवा दिया
एक बार फिर मैंने
खुद को मिटा दिया।।
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