गुरुवार, 13 अक्टूबर 2016

नही आया

मुझे अश्कों की मोती दिखाना भी नही आया।
छुपाना था जिसे सबसे छुपाना भी नही आया।।

शबे गम को कभी फुर्सत में कहना था मगर।
मेरे हालात से मुझको ही मुकरना भी नही आया।।

मै हूँ एक फूल सी नाजुक मुझे काटों ने घेरा है।
मगर अफ़सोस है मुझको बिखरना भी नही आया।।

तेरे राहों पे चलने की ख्वाहिश थी बहुत मुझको।
मगर गम है की कांटो कोही सिमटना भी नही आया।।

कभी सुख की पुरवाई गमो को दूर ले भागी।
ख़ुशी के अश्क आँखों से गिराना भी नही आया।।

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