मंगलवार, 29 नवंबर 2016

टूटते सपने

रोज बुनती हूँ सपने
इरादों के मजबूत धागों से
एक एक जिरह बाँधती हूँ
मजबूत इरादों से
कही जो झरोखा नजर
आये तो एक एक जिरह
खोलती हूँ..
कुछ इस तरह से मैं
रोज अपने सपने तोड़ती हूँ
उम्र गुजर गयी धागों
को खोलते बुनते
पर आज भी सपने
अधूरे ही रहे...
टाट की पैबन्द से
कबतक छुपाऊँ आँखों
की नमी अपनी
किसको और कैसे बताऊँ
मैं कमी अपनी..
उलझे धागों की गाँठो
को रोज तोड़ती जोड़ती हूँ
कुछ इस तरह से मैं रोज
अपने सपने तोड़ती हूँ..
रिश्तों नातो की भीड़ में
मैं ऐसे खोई...
खुद अपने सपने तोड़ कर
मैं बहुत रोई...
ये ताने बाने तो जिंदगी के
चलते ही रहेंगे..
जबतक है कायनात
सपने पलते ही रहेंगे
मेरी ज़िरह ही मेरी बगावत होगी
अदावते रियायतें तो चलते
ही रहेंगे...
ऐसी बातों से ही खुद को
झकझोरती हूँ...
मैं इस तरह से रोज एक सपने
तोड़ती हूँ..

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