गुरुवार, 31 मार्च 2016

मैं खुद से हारी हूँ

शायद अपने ही कथन के बिपरीत
चल रही है जिंदगी
शायद इसीलिए पल पल बदल
रही है जिंदगी
सोचा था आकाश के तारे तोड़कर
रोशन कर दूँगी
अपने बच्चों का दामन खुशियों से
भर दूँगी
शायद नाकाम हूँ मैं सिर्फ परेशानियों
का नाम हूँ।
शायद इसीलिए आज खुद से हारी हूँ
अब पता चला मैं एक नासूर सी बिमारी हूँ
दुनियां के सवालो से डर लगता है
कौन हूँ मैं ये तक भूल जाने का मन करता है,
तुम परछाई हो मेरी मेरे जीवन का तार हो
कुछ हो जाता तो क्या होता
मेरा वजूद खुद अपना मूल्य खोता
कभी कभी बस ये ही सोच कर
रो जाने का मन करता है,
दुनिया की इस भीड़ में बस खो जाने
का मन करता है...

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें