दिन के उजास में
या शाम की गहराई में
लोगो की भीड़ में
या गजब की तन्हाई में
दिल ढूँढता फिरता है
मेरा अक्स किधर है
जो मुझको चला रहा है
वो सख्श किधर है.....
मुझमेँ अगर मै हूँ
तो मै ऐसी क्यों हूँ
मुझमेँ अगर तू है
तो तू दीखता क्यों नही
मोल है मेरा बेमोल तू है
तो बिकती सिर्फ मै क्यों
तू बिकता क्यों नही....
प्रश्न उठता है जेहन में
जवाब भी मिलना चाहिए
जिंदगी में वक्त का हिसाब
भी मिलना चाहिए....
यूँ तो अजनबी राहें भी
मेरे साथ साथ चलती है
शायद इसी लिए हर
ख्वाहिशे पिघलती है....
दुनियां फरेब है या
नजरों का धोखा है
चल जी ले जिंदगी
तुझे किसने रोका है..
मै मुझमे नही तू
तुझमें नही..
पर सच तो यही है
तू अक्स है मेरा
और मै परछाई हु तेरी...
दिव्या पाण्डेय ऋतू
10-09-2016
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