खुद को लिखूँ खुद को पढूँ
कलम चाहती है नया कुछ गढ़ूं
विचारों की शक्ति धूमिल सी है
मन कुछ कुछ बोझिल सी है।।
नई चेतना मन को आतुर करे है
पुरवायियों में रंग से भरे है
नया दिन निकलने को व्याकुल खड़ा है
मगर रास्ता भी लम्बा बड़ा है।।
कही धूप है तो कही छाँव भी है
शहर में भटकती रूह की गाँव भी है
वहाँ चैन जन्नत की मिलती बहुत है
मगर रिश्तो में मिलावट बहुत है।।
कोई आज में जीता है कोई कल को रोता है
कोई खोकर पाता है कोई पाकर खोता है
रोने की सबको है आदत पुरानी
यही बात सदियों से बनती कहानी।।
मुझे आज खुद को पढ़ना पड़ेगा
कोई राह मुझको भी गढ़ना पड़ेगा
छोड़ किस्से कहानी की बातो को अब तो
एक नया धुन से आगे बढ़ना पड़ेगा।।
#सच_है_की_हम_बदलेंगे_युग_बदलेगा
शुभरात्री
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें