वर्षो से तरसे है सुकून ए नींद की खातिर
अब हिज्र की रात है जरा चैन से सोने दे।।
कब से चाहा था कभी सुकून मिले हमको।
ख़ुशी की घड़ी में कुछ मेरे दर्द को खोने दे।।
क्या मालूम कब जिंदगी की शाम हो जाए।
लगजा सीने से मेरे हर दर्द को तो रोलेने दे।।
कवायतें रियायतें बहुत देखे है सुने है मैंने।
मानूँगी तेरे हर एहसान जरा वक्त तो होने दे।।
उजाले फ़क़त चैनके खातिर चुना था तुझको।
दुवा का दौर अभी कहाँ?जरा शाम तो होने दे।।
दिव्यापाण्डेय ऋतू
05-09-2016
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