शनिवार, 17 दिसंबर 2016

भाव

जब जब मेरे भाव मेरे शब्द बनते है
अनगिनत बातें निकलती है
अनगिनत कहानियाँ बनती है
कभी समाज की रीत
तो कभी सद्भावना और प्रीत बनती है
रोज कुछ भाव उभरते
रोज कुछ गीत बनते
कुछ कहते कुछ सुनते
रोज उभरते भाव...
सोचती हूँ भावनाओ की
की मोती से माला बनाऊ
लगा दूँ हाट और बाजार में
फिर देखूँ कितने रिश्ते लगते है
कतार में भावनाओ को खरीदने
क्योंकि अनमोल चीजे कोई अब लेता नही
बिकता है जो दाम से वही चलता है
संसार में....
#आभार_के_साथ_शुभ_रात्री

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