मुझे पार जाना है
सोच के पार
तुम्हारी इसकी उसकी सबके सोच
से आगे
जहाँ से दायरा और दिवार
दोनों के ही सीमाओ का
अतिक्रमण होता है
बेतुके सवालो
और बेतुके ख़यालो
से बहुत दूर
अपनी बनाई हुयी
मर्यादित दुनियां में
हा सच मुझे दूर जाना है
बहुत दूर
जहाँ हँसने के लिए
झूठ ना हो
जहाँ गाने के लिए
गम ना हो
जहाँ रोने के लिए
अपमान व तिरस्कार ना हो
जहाँ झूठे सपने व
झूठा प्यार ना हो
हा जाना है मुझे
चेखवो की दुनिया में
सच जीने
सच में ही रहने
मुझसे रिश्तों का तिरस्कार
सहा नही जाता
भावनाओ की चीत्कार
सही नही जाती
गुमनामी मुझे रास नही आती
नाम के खातिर फरेब करूँ
मुझे मंजूर नही
क्योंकि इस फरेबी दुनियां में
सच्चाई का अब दस्तूर नही।।
मैं एक कवयित्री और लेखिका हूँ, जो शब्दों में अपनी भावनाओं की छवियाँ उकेरती है। यह मेरा छोटा-सा संसार है, जहाँ एहसास कविता बनकर और अनुभव शब्द बनकर जीवित हो उठते हैं।
बुधवार, 14 दिसंबर 2016
गुमनामी
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें