बुधवार, 14 दिसंबर 2016

गुमनामी

मुझे पार जाना है
सोच के पार
तुम्हारी इसकी उसकी सबके सोच
से आगे
जहाँ से दायरा और दिवार
दोनों के ही सीमाओ का
अतिक्रमण होता है
बेतुके सवालो
और बेतुके ख़यालो
से बहुत दूर
अपनी बनाई हुयी
मर्यादित दुनियां में
हा सच मुझे दूर जाना है
बहुत दूर
जहाँ हँसने के लिए
झूठ ना हो
जहाँ गाने के लिए
गम ना हो
जहाँ रोने के लिए
अपमान व तिरस्कार ना हो
जहाँ झूठे सपने व
झूठा प्यार ना हो
हा जाना है मुझे
चेखवो की दुनिया में
सच जीने
सच में ही रहने
मुझसे रिश्तों का तिरस्कार
सहा नही जाता
भावनाओ की चीत्कार
सही नही जाती
गुमनामी मुझे रास नही आती
नाम के खातिर फरेब करूँ
मुझे मंजूर नही
क्योंकि इस फरेबी दुनियां में
सच्चाई का अब दस्तूर नही।।

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