हमने तो जो भी लिखा तजुर्बा ही लिखा।
सीख लो जीवन क्या है और जीना क्या।।
जब ग़मे जिंदगी से बहाली ना मिले तो।
पतझड़ क्या सावन क्या महीना क्या ।।
हम तो ढूंढते ही रहे फ़क़त उजाले हरदम।
मिले जो नूर तो क्या और नगीना भी क्या।।
तमाम उम्र गुजर गयी सम्भालते खुद को।
इस जिंदगी में पाना क्या और खोना क्या।।
जो मिला कबूल है मुझको गम हो या ख़ुशी।
खुदा तेरे दरबार में अब रो रो कर जीना क्या।।
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