फेमिनिज़्म का मूल उद्देश्य स्त्री और पुरुष के बीच समान अधिकार, सम्मान और अवसर सुनिश्चित करना है। लेकिन समाज में अक्सर इसे गलत समझ लिया जाता है और इसके लिए स्त्रियों को ही दोषी ठहराया जाता है। यह प्रवृत्ति विशेष रूप से तब दिखाई देती है जब आधुनिकता या बदलते सामाजिक व्यवहार को “अमर्यादा” से जोड़कर स्त्रियों पर आरोप लगाया जाता है।
समाज में यह धारणा बनी हुई है कि क्लबों में जाना, आधुनिक वस्त्र पहनना या खुलकर व्यवहार करना स्त्रियों के “अमर्यादित” होने का संकेत है। जबकि वास्तविकता यह है कि किसी व्यक्ति के कपड़े या बाहरी व्यवहार को ही उसके संस्कारों का पूर्ण मापदंड नहीं माना जा सकता। मैंने अक्सर देखा है कि पुरुष शराब के नशे में अनुचित व्यवहार करते हैं, घर में हिंसा करते हैं या सार्वजनिक स्थानों पर स्त्रियों के प्रति असम्मानजनक दृष्टि रखते हैं। इसके बावजूद ऐसे व्यवहार को समाज में कई बार सामान्य मान लिया जाता है।
“अमर्यादा” की अवधारणा को केवल कपड़ों या बाहरी आचरण तक सीमित करना एक संकीर्ण दृष्टिकोण है। संस्कार व्यक्ति के आचरण, विचारों, दूसरों के प्रति सम्मान और जिम्मेदारी में प्रकट होते हैं। छोटे या बड़े कपड़े पहनना अपने आप में अमर्यादा नहीं है; बल्कि किसी की स्वतंत्रता को बाधित करना, उसके प्रति अपमानजनक व्यवहार करना और उसकी गरिमा को ठेस पहुँचाना वास्तविक अमर्यादा है।
समाज में यह भी देखा जाता है कि सड़क पर स्त्रियों को घूरना या उनके प्रति असहज व्यवहार करना एक सामान्य प्रवृत्ति बन चुकी है, जिसे कई बार अनदेखा कर दिया जाता है। यह स्थिति दर्शाती है कि समस्या स्त्रियों के व्यवहार में नहीं, बल्कि उस मानसिकता में है जो उन्हें हर परिस्थिति में दोषी ठहराने की कोशिश करती है।
अतः फेमिनिज़्म को समझने की आवश्यकता है, न कि उसे दोष देने की। यह एक ऐसा विचार है जो समाज में व्याप्त असमानताओं और पूर्वाग्रहों को उजागर करता है और स्त्रियों के अधिकारों तथा सम्मान की बात करता है। समाधान स्त्रियों को सीमित करने में नहीं, बल्कि समाज की सोच को व्यापक और संतुलित बनाने में है।
अतः “अमर्यादा” की सही परिभाषा को समझना और उसे कपड़ों या बाहरी रूप से जोड़ने के बजाय व्यवहार और मानसिकता के आधार पर देखना आवश्यक है। तभी एक समान, न्यायपूर्ण और संतुलित समाज की स्थापना संभव हो सकती है।
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