सोमवार, 23 मार्च 2026

समाधि का सुकून

थक गई हूँ इस जग की रीत से,
अब मन हटता हर एक प्रीत से।

भीड़ में रहकर भी खोई हूँ,
अब दूरी चाहूँ हर संगीत से।

न चाह रही, न आस कोई,
न मन में कोई प्यास नई,

बस चुप बैठी हूँ खुद के संग,
जैसे रुक गई हर साँस यहीं।

जहाँ न हँसी का शोर मिले,
न आँसू का कोई छोर मिले,

वो एक जगह है भीतर ही—
जहाँ बस शांत सा ठौर मिले।

अब जीत-हार सब एक लगे,
हर रिश्ता जैसे रेत लगे,

इस गहरे मौन के आँगन में,
समाधि ही सच्चा हेत लगे।

न कुछ पाना, न कुछ खोना,
न अपना कोई, न पराया होना,

इस सूने से सुंदर क्षण में—
बस खुद में खुद का समा जाना।

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