थक गई हूँ इस जग की रीत से,
अब मन हटता हर एक प्रीत से।
भीड़ में रहकर भी खोई हूँ,
अब दूरी चाहूँ हर संगीत से।
न चाह रही, न आस कोई,
न मन में कोई प्यास नई,
बस चुप बैठी हूँ खुद के संग,
जैसे रुक गई हर साँस यहीं।
जहाँ न हँसी का शोर मिले,
न आँसू का कोई छोर मिले,
वो एक जगह है भीतर ही—
जहाँ बस शांत सा ठौर मिले।
अब जीत-हार सब एक लगे,
हर रिश्ता जैसे रेत लगे,
इस गहरे मौन के आँगन में,
समाधि ही सच्चा हेत लगे।
न कुछ पाना, न कुछ खोना,
न अपना कोई, न पराया होना,
इस सूने से सुंदर क्षण में—
बस खुद में खुद का समा जाना।
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