मिलन के प्रथम क्षण से मृत्यु के अंतिम श्वास तक,
यदि हृदय का भाव अपरिवर्तित रहे — वही प्रेम है।
जो काल की प्रचंड धारा में भी अविचल रहे,
जो परिस्थितियों के प्रहार से भी न डिगे —
वही शाश्वत प्रेम है।
जब प्रथम बार
किसी की स्मृति बिना आमंत्रण
मन के आकाश पर उदित हो जाए,
और किसी का नाम
अंतरतम में प्रार्थना-सा बस जाए,
तभी प्रेम का बीज अंकुरित होता है।
प्रेम कोलाहल नहीं करता,
वह मौन की गहराइयों में जन्म लेता है।
जैसे निशा की निस्तब्धता में
दीपक की लौ स्वयं प्रकाशित हो उठे।
कालचक्र निरंतर घूमता है,
ऋतुएँ बदलती हैं,
यौवन की आभा क्षीण हो जाती है,
पर यदि हृदय की दिशा
अब भी उसी एक नाम की ओर प्रवाहित हो —
तो वही प्रेम है।
प्रेम अधिकार नहीं माँगता,
वह समर्पण का सौम्य आलोक है।
जहाँ अहं धीरे-धीरे विलीन हो जाता है,
और किसी का सुख
अपने अस्तित्व से अधिक प्रिय हो उठता है।
कभी वह मधुर स्मित बनकर जीवन को सुगंधित करता है,
कभी विरह बनकर आत्मा को तपाता है।
पर जो विरह में भी
किसी के कल्याण की कामना करे —
वही सच्चा प्रेम है।
जब आयु की संध्या समीप आती है,
और स्मृतियों का आकाश धुंधला होने लगता है,
यदि उसी धुंध में
एक ही छवि उज्ज्वल बनी रहे —
तो समझो प्रेम अभी भी जीवित है।
मिलन के प्रथम क्षण से
मृत्यु के अंतिम श्वास तक,
यदि हृदय का भाव
न काल से पराजित हो,
न परिस्थितियों से परिवर्तित —
तो वही प्रेम है।
वही प्रेम
जो आत्मा का शाश्वत आलोक है,
वही प्रेम
जो देह के नष्ट हो जाने पर भी
स्मृतियों के आकाश में
दीर्घकाल तक दीप्तिमान रहता है।
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