यह घोषणा करने नहीं आई हूँ।
न किसी की ऊँचाई नापने,
न किसी की छाया में
अपना कद तलाशने आई हूँ।
मैं तो बस
अपने होने की कहानी
स्वयं लिखने आई हूँ।
युगों से इतिहास की
पीली पड़ती पांडुलिपियों में
कितने ही नाम
अनलिखे रह गए,
कितनी ही आवाज़ें
समय की धूल में दब गईं।
मैं उन्हीं
अनकहे स्वरों की प्रतिध्वनि हूँ,
जो अब मौन नहीं रहना चाहती।
मेरे भीतर
एक आकाश है—
जिसे किसी सीमा की
ज़रूरत नहीं।
मेरे भीतर
एक अग्नि है—
जो किसी को भस्म करने नहीं,
बल्कि अपने अंधकार को
प्रकाश में बदलने के लिए जलती है।
मैं किसी से श्रेष्ठ होने की
लालसा लेकर नहीं आई,
पर स्वयं को तुच्छ मान लेने की
परंपरा भी स्वीकार नहीं करती।
मैंने सीखा है—
नदी की तरह बहना,
पर्वत की तरह अडिग रहना,
और आकाश की तरह
स्वतंत्र होना।
यदि मार्ग में
आँधियाँ भी आएँगी,
तो वे मेरी दिशा नहीं बदलेंगी,
वे केवल यह प्रमाण देंगी
कि मेरा दीपक अब भी जल रहा है।
क्योंकि मैं
प्रतिस्पर्धा की कहानी नहीं,
अस्तित्व की कहानी हूँ।
मैं किसी से कम नहीं,
यह साबित करने नहीं आई—
मैं तो बस
अपने जीवन की श्वेत धरती पर
अपने स्वप्नों की लिपि
स्वयं अंकित करने आई हूँ।
और जब समय
मेरे जीवन का अंतिम पृष्ठ पलटेगा,
तो वह देखेगा—
एक स्त्री थी
जो किसी से बेहतर बनने नहीं निकली थी,
पर अपने होने की कथा
इतनी गहरी लिख गई
कि समय भी
उसे मिटा न सका।
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