ये एहसासों की गठरी है — इसका कोई व्याख्यान नहीं।
वेदों की ऋचाएँ मौन हुईं,
शास्त्रों की वाणी थक जाती है,
जब हृदय के गूढ़ प्रदेशों में
प्रेम स्वयं प्रकट हो जाता है।
न यह तर्कों से बँध पाता है,
न शब्दों से सीमित होता है,
यह तो आत्मा की उस धारा सा है
जो अनंत दिशाओं में बहता है।
जब प्रथम बार
किसी की स्मृति
मन के आकाश पर
चन्द्रमा-सी उदित होती है,
तभी हृदय के निर्जन वन में
प्रेम का अंकुर फूटता है।
कभी वह विरह की अग्नि बन
चेतना को तपाता है,
कभी मिलन की सुधा बनकर
जीवन को सरस बनाता है।
न उसका कोई आकार है,
न उसका कोई विधान है,
वह तो केवल अनुभूति है—
जो आत्मा से आत्मा तक
अदृश्य सेतु बन जाती है।
युगों से मुनि और कवि
उसके रहस्य को टटोलते रहे,
पर अंततः
मौन ही उनका अंतिम उत्तर बना।
क्योंकि प्रेम वह रहस्य है
जिसे जानना संभव है,
पर कहना संभव नहीं।
इसलिए आज भी
समय के विस्तृत आकाश में
एक ही सत्य गूंजता है—
प्रेम को कर दे परिभाषित — ऐसा कोई विद्वान नहीं,
ये एहसासों की गठरी है —
इसका कोई व्याख्यान नहीं।
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