शनिवार, 4 अप्रैल 2026

दोहरे चेहरे

क्यों नहीं हो पाते हम
वैसे ही—
जैसे होने का स्वप्न
अपनी ही आँखों में सँजोते हैं?
क्यों ओढ़ लेते हैं हम
मुस्कानों के उजले आवरण,
जब भीतर का आकाश
अब भी संध्या की उदासी से भीगा होता है?
हम चलते तो हैं प्रकाश की ओर,
पर छायाओं को
आँचल में छुपाए रखते हैं—
मानो सत्य का स्पर्श
हमें स्वयं से ही अपरिचित कर देगा।
क्या यह भय है?
या वह आदत,
जिसने हमें सिखा दिया है
कि दुनिया के सामने
एक और चेहरा पहन लेना ही सहज है?
हम अपने ही भीतर
कितने अजनबी हो गए हैं—
जहाँ भावनाएँ भी
स्वर लेने से पहले
अनुमति माँगती हैं।
दिखावे के ये आवरण
कभी-कभी इतने सघन हो जाते हैं
कि असली “मैं”
उनकी तहों में कहीं खो जाता है—
जैसे कुहरे में
भोर का पहला प्रकाश भटक जाए।
कितना सरल होता—
यदि हम वही रहते
जो हम हैं,
यदि शब्दों में वही सच्चाई होती
जो मौन में छिपी है।
पर शायद
यह संसार अभी इतना निश्चल नहीं
कि नग्न सत्य को स्वीकार सके—
इसलिए हम
अपने ही अस्तित्व को
संकोच की चादर में लपेटे रहते हैं।
और यूँ ही—
जीवन की संध्या तक
हम खोजते रह जाते हैं
वह चेहरा,
जो कभी हमारा अपना था…
पर अब
दिखावे की धूल में
धीरे-धीरे धुँधला गया है।

जय श्री राम 🙏

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