उषा की पहली काया हूँ,
अंधियारे के हर कोने में
जगमग करती माया हूँ।
मैं आँसू की थरथर बूंद नहीं,
मुस्कान की मधुर भाषा हूँ,
टूटे मन के निर्जन वन में
फिर से खिलती आशा हूँ।
मैं पीड़ा की परछाईं नहीं,
स्पर्श सुखद विश्वासों का,
सूनी राहों पर बिछ जाती
संगीत बनी उल्लासों का।
मैं सीमित क्षण की छाया नहीं,
असीमित विस्तारों की धारा,
हर हृदय में बहती चुपचाप
जीवन का उजियारा।
मैं हार नहीं, स्वीकार नहीं,
संघर्षों की परिभाषा हूँ,
मैं ही अंत नहीं जीवन का—
नव आरंभ की भाषा हूँ।
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