तुम जली तो साथ मे तुम्हारे सारे सपने जल गए...ऐसा क्यों हुवा तुम्हारे साथ मन बहुत व्यथित हो गया सुनकर...तुम तो जिंदादिल औरत थी संस्कारी सभ्य और हुनरमंद..फिर क्यों जला दिया तुम्हे क्या नही कर पाई...
वाह रे दुनियाँ सारी त्रासदी का अंत केवल औरत को जलाकर ही होता है क्या???
चूल्हे में तपती औरत की जिंदगी
इच्छाओ की लकड़ी पर
सपनो को जलाकर
रोज झुलसती औरत की जिंदगी
ना खुद के अरमान
ना खुद के सपने
ना कोई अपना वजूद
फिर भी उलझती सी औरत की जिंदगी
भूमिकाये अलग अलग
माँ बहन बेटी बहु बीबी
गजब की कलाकार है
हर किरदार में है औरत की जिंदगी
कभी दायरा तो कभी दीवार
कुछ भी नही लांघती
फिर भी कैद फिर भी कैद
रोज दीवारों में चुनती औरत की जिंदगी
संस्कारो की चादर में समेटकर
दहलीज के अंदर समाये है
अपने ही अंदर घुटकर
मर्यादा को बचाये है
फिर भी जलती है हरबार औरत की जिंदगी।
मैं एक कवयित्री और लेखिका हूँ, जो शब्दों में अपनी भावनाओं की छवियाँ उकेरती है। यह मेरा छोटा-सा संसार है, जहाँ एहसास कविता बनकर और अनुभव शब्द बनकर जीवित हो उठते हैं।
सोमवार, 25 दिसंबर 2017
औरत की जिंदगी
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