कभी चहकती चिड़िया
आज लाचार सी है
हा समाज का सच ही तो है
जो आज की नारी बीमार सी है...
कभी उसके चहचहाने से
बगियाँ गूंज जाती थी
आज खामोशियो में ही
सदियां बीत जाती है...
कभी रातें छोटी लगती थी
और दिन बड़ी सी लगती थी
अब रातें है सदियों जैसा
और दिन है तिनका तिनका सा
जीना भी अब क्या जीना है
जीवन तो है मरना सा...
जब जब उभरी शक्ति बनकर
तब तब उसका प्रतिकार हुवा
पर सच है जब जब देवी माना
तब तब समाज का उद्धार हुवा
मत भूलो की नारी माता है
जिसने नर की नीव रखी
फिर भी नर के ही कारण क्यों
आज हर नारी है बहुत दुःखी
कभी सीता बनकर हरी गयी
कभी दामिनी सी ठगी गयी
ये रूप बदलता नर ही क्यूँ
क्यूँ काली बनती नारी ना
क्यूँ आखिर क्यों?????
मैं एक कवयित्री और लेखिका हूँ, जो शब्दों में अपनी भावनाओं की छवियाँ उकेरती है। यह मेरा छोटा-सा संसार है, जहाँ एहसास कविता बनकर और अनुभव शब्द बनकर जीवित हो उठते हैं।
मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017
आखिर क्यूँ
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