बोझील जिंदगी का वज़न बेवज़ह उठाते चले गए।
हर एक से रिश्ता तहे दिल से निभाते चले गए।।
मुशाफिर तो बहुत थे जिंदगी के सफर में लेकिन।
काफिर दिल को अकेले ही हम घुमाते चले गए।।
एक उम्मीद से जुड़ा था दिल मरहम तो मिलेगा।
सभीके हाथ में खंजर था और चुभाते चले गए।।
मैं अपने घाव को किसी को दिखाती भी तो कैसे।
मेरे रहनुमा भी घावो पर नमक लगाते चले गए।।
मैंने अरमानो को जलाया फ़क़त रौशनी के लिए।
उजाले ख़ाक मिले मेहरबाँ दिए बुझाते चले गए।।
माँ बहन बेटी बहु बनकर जिंदगी कैसे गुजारती।
रिश्ते बेमोल के थे सब पल्ला छुड़ाते चले गए।।
हर हाथ में था पत्थर और मुजरिम बनी थी मै।
अपनी मर्जी से मुझपर पत्थर बहाते चले गए।।
ऐ खुदा खुशियों से भर सकता था दामन भी मेरा।
तेरे करम से हम दामन में कंकड़ उठाते चले गए।।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें