मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

दिल बंजारा सा

दिल बंजारा सा
घूमता आवारा सा
गलियाँ गलियाँ शहर शहर
कभी इस पहर कभी उस पहर
कभी इधर ठहर कभी उधर ठहर
दिल बंजारा सा...
जाने क्या ढूंढे जाने क्या चाहे
जाने किस तरह जाती है ये
अनजान सी गुमसुम सी राहे
ये अजनबी राहे
खड़ी है फैलाये बाहें
फिर भी दिल बंजारा सा...
हर बस्ती का एक चौराहा
चार दिशाएं ले जाए
खुशियों की दस्तक दे मुझको
वो मंजिल कैसे हम पाये
कभी रुकी रुकी कभी
भागमभाग ये दिल बंजारा सा...
नादान है दिल ना समझ है मन
बेसुध सा है जीवन का प्रण
कभी समझ के समझे
कभी उलझ गए
जाने कब संवरे
कब बिखर गए
कभी बहक बहक
कभी संभल सम्भल
ये बंजारा सा दिल
घूमता आवारा सा...

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