इस जमाने मे उस जमाने की बातें किया करते है।
एक हम है दोस्तो जो बेबाक ही जिया करते है।।
कभी कोई अलाप नही पुराने रागों का मुझपर।
हम तो हर रोज एक नया धुन रचा करते है।।
जिसको देखो यहाँ गुमान है अपनी हस्ती का।
एक हम है जो जमीं पर औकात देखा करते है।।
नई रवायतें ना चढ़ी ना अदावतों का पर्दा ही लगा।
हम तो आंखों में तसव्वुर को छुपा के रखते है।।
कोई मिटा के दिखाए खुद को किसी के लिए।
हम तो हर रोज हर वक्त तुझपर ही मिटा करते है।।
मुझको गिला नही तू रह पुराने ढर्रे पर अपने।
हम तो हर रोज एक नया आसमान गढ़ते है।।
डॉ दिव्या पाठक
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें